
[Given below is a short Nazm by my favourite Shaayar, Saahir Ludhiyaanwi Saab. I don't exactly remember where I had read it first but for some strange reason, it has stayed in my memory. How I wish I had even a fraction of the eloquence that Saahir Saab possessed ! Take a bow, Saahir Saab !]
वो कहती है ......
बताओ बे सबब क्यूँ रूठ जाते हो ?
मैं कहता हूँ ...
ज़रा मुझ को मनाओ ...... .अच्छा लगता है
वो कहती है
मेरा दिल तुम से आख़िर क्यूँ नहीं भरता ?
मैं कहता हूँ ....
मोहब्बत की कोई हद ही नहीं होती ....!
वो कहती है ....
बताओ ...मैं तुम्हें क्यूँ भा गई इतना ?
मैं कहता हूँ ...
मेरी जां हादसे तो हो ही जाते हैं !
वो कहती है ...
अचानक मैं तुम्हें यूँ ही रुला दूँ तो ?
मैं कहता हूँ ...
मुझे डर है के तू भी भीग जाएगी ...!
वो कहती है ...
बताओ ..बारिशों की क्या हकीकत है ?
मैं कहता हूँ ...
के ये तो बादलों की आँख रोती है ...!
वो कहती है ...
तुम्हारे ख़्वाब सारे क्यूँ अधूरे हैं ?
मैं कहता हूँ ...
मेरी जां तुम इन्हें तक्मील दे दो न ...!
2 comments:
the last lines
tum inhe takmeel de do na
wah . shair saab ki nazm tumhare blog pr padh kar khushi hui.
ustaad tumhari shayri ki samjh kamal hai
Ankit
Shukriya Bandhu lekin asli kamaal to Saahir Saab ki shayri ka hai, Guru! Hum jaise naacheez to bas samajh hi lein to bohot hai!
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